वॉशिंगटन/नई दिल्ली: भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी को अमेरिकी अदालत से बहुत बड़ी राहत मिली है। अमेरिकी न्याय विभाग (US Department of Justice – DoJ) ने न्यू यॉर्क की फेडरल कोर्ट में अडानी ग्रुप के खिलाफ चल रहे सभी आपराधिक धोखाधड़ी (Criminal Fraud) के मामलों को स्थायी रूप से खारिज (Dismiss with prejudice) कर दिया है। अमेरिकी सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए उनके पास न तो कोई ठोस सबूत हैं और न ही इसका कोई कानूनी आधार है।
इस फैसले के बाद अब यह केस हमेशा के लिए बंद हो गया है, जिसे अडानी समूह के लिए एक ऐतिहासिक और अंतिम कानूनी जीत माना जा रहा है।
राजनीतिक घमासान: जब भारतीय विपक्ष ने बनाया था सबसे बड़ा मुद्दा
यह मामला केवल कानूनी गलियारों तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत की राजनीति में पिछले कई महीनों से भूचाल मचाए हुए था। जैसे ही अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) और न्याय विभाग ने करीब $250 मिलियन की कथित रिश्वतखोरी के आरोप लगाए थे, भारतीय विपक्षी दल पूरी तरह हमलावर हो गए थे:
- संसद से सड़क तक हंगामा: कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी पार्टियों ने संसद के सत्रों को ठप कर दिया था। विपक्ष का सीधा आरोप था कि केंद्र सरकार अडानी समूह को “शैल कंपनियों” और “भ्रष्टाचार” के जरिए फायदा पहुंचा रही है।
- राहुल गांधी के तीखे हमले: विपक्ष के प्रमुख नेता राहुल गांधी ने कई प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सीधे प्रधानमंत्री और गौतम अडानी के रिश्तों पर सवाल उठाए थे। उन्होंने मांग की थी कि गौतम अडानी को तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए और इस मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन हो।
- छवि खराब करने की कोशिश: विपक्षी नेताओं ने अमेरिकी जांच का हवाला देकर यह नैरेटिव बनाने की कोशिश की थी कि भारत की साख पूरी दुनिया में गिर रही है और देश की वित्तीय संस्थाएं (जैसे SEBI) दबाव में काम कर रही हैं।
अमेरिकी अदालत में कैसे पलटा पूरा पासा?
अडानी समूह की मजबूत कानूनी टीम (जिसमें अमेरिका की दिग्गज लॉ फर्म सुलिवन एंड क्रॉमवेल शामिल थी) ने अमेरिकी न्याय विभाग के सामने करीब 100 स्लाइड्स की एक विस्तृत प्रस्तुति दी। इसके बाद अमेरिकी न्याय विभाग ने खुद कोर्ट से इस केस को पूरी तरह ड्रॉप करने की गुजारिश की। अमेरिकी सरकार ने कोर्ट में जो दलीलें दीं, उन्होंने विपक्ष के आरोपों की हवा निकाल दी:
“अमेरिका ‘वर्ल्ड पुलिस’ नहीं बन सकता” अमेरिकी न्याय विभाग ने कोर्ट में कहा कि यह मूल रूप से एक विदेशी मामला है, जहां भारतीयों ने भारतीय अधिकारियों को भारत में बिजली सप्लाई के कॉन्ट्रैक्ट के लिए कथित तौर पर प्रभावित किया। इसमें अमेरिकी क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का उल्लंघन कर अमेरिका का ‘वर्ल्ड पुलिस’ बनना सही नहीं है, इससे राजनयिक संबंध खराब हो सकते हैं।
अमेरिकी जांच एजेंसी ने कोर्ट के सामने तीन सबसे बड़ी बातें मानीं:
- एक पैसे का नुकसान नहीं: अमेरिकी निवेशकों को इस पूरे मामले में एक भी पैसे का वित्तीय नुकसान (Not a single penny lost) नहीं हुआ है। सभी बॉन्ड्स और पेमेंट्स समय पर चुकाए जा रहे हैं।
- सबूतों का भारी अभाव: अमेरिकी अभियोजकों के पास आरोपों को साबित करने के लिए कोई पुख्ता सबूत नहीं थे, क्योंकि मामले से जुड़े गवाह और दस्तावेज भारत में हैं।
- भारत में क्लीन चिट: अमेरिकी विभाग ने स्वीकार किया कि भारत की स्थानीय जांच एजेंसियों और सेबी (SEBI) ने पहले ही इन आरोपों की गहन जांच की है और उन्हें कोई गड़बड़ी या कानून का उल्लंघन नहीं मिला है।
क्या हुआ सिविल सूट का?
आपराधिक मामले पूरी तरह खारिज होने के साथ ही, SEC के साथ चल रहे सिविल मामले को भी आपसी समझौते के तहत सुलझा लिया गया है। गौतम अडानी ने $6 मिलियन और सागर अडानी ने $12 मिलियन का सिविल जुर्माना देने पर सहमति जताई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस भुगतान को “बिना किसी दोष स्वीकार किए” (Without admitting any guilt) किया गया है, जो कॉरपोरेट जगत में मुकदमों के लंबे चक्र से बचने की एक सामान्य प्रक्रिया है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस अंतिम फैसले के बाद वैश्विक बाजारों में अडानी समूह की साख और मजबूत होगी। अब कंपनी अमेरिकी इक्विटी और डेट मार्केट से बिना किसी अड़चन के फंड जुटा सकेगी और अमेरिका में अपने $10 बिलियन के निवेश प्लान को तेजी से आगे बढ़ाएगी।
अडानी केस खारिज होने पर संजय हेगड़े का विश्लेषण
इस विश्लेषण में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने विस्तार से समझाया है कि किस तरह अडानी समूह के खिलाफ अमेरिकी अदालतों में चल रहे इस हाई-प्रोफाइल मामले को खारिज किया गया और इसके पीछे क्या कानूनी दांव-पेंच रहे।
